Wednesday, May 6, 2026

Jaane kabse Roohon ka ye jism badalna jaari hai- a deep Urdu poem by an Indian poet

 

Sharing a beautiful Urdu poetry by an Indian Urdu poet. Every line of this poem resonated so deep that I had to post it separately.


"रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है

जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है

 

तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए

सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है

 

जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा

फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

 

बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था

एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

 

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से

वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है"

 

- Rajesh Reddy


No comments:

Post a Comment